रामचरितमानस · काण्ड 04
किष्किन्धाकाण्ड
193 पद · दोहे, सोरठे, चौपाइयाँ, छंद और श्लोक। पहले PDF भावार्थ, फिर मूल पाठ और शब्द-दर-शब्द अर्थ।
193 कुल पद32 दोहा2 सोरठा154 चौपाई3 छंद2 श्लोक
भावार्थ: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण के PDF से; शब्द-दर-शब्द अर्थ AI प्रारूप हैं और समीक्षा बाकी है।
32दोहेकिष्किन्धाकाण्ड के दोहे →2सोरठेकिष्किन्धाकाण्ड के सोरठे →154चौपाइयाँकिष्किन्धाकाण्ड की चौपाइयाँ →3छंदकिष्किन्धाकाण्ड के छंद →2श्लोककिष्किन्धाकाण्ड के श्लोक →
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श्लोक
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौकुन्दपुष्प और नील कमलके समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान्, विज्ञानके धाम, शोभा…श्लोकब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययंवे सुकृती (पुण्यात्मा पुरुष) धन्य हैं जो वेदरूपी समुद्र [के मथने] से उत्पन्न हुए कलियुगके …सोरठा मुक्ति जन्म महि जानि ग्यानजहाँ श्रीशिव-पार्वती बसते हैं, उस काशीको मुक्तिकी जन्मभूमि, ज्ञानकी खान और पापोंका नाश करन…सोरठा जरत सकल सुर बृंद बिषमजिस भीषण हलाहल विषसे सब देवतागण जल रहे थे उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन! तू…