उत्तरकाण्ड · श्लोक · श्लोक
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
मूल पाठ
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।
स्रोत अभिलेख 7.13 · पुस्तक पृ. 1044, 1047
भावार्थ
मूल पाठ के बादजैसे कामीको स्त्री प्रिय लगती है और लोभीको जैसे धन प्यारा लगता है, वैसे ही हे रघुनाथजी! हे रामजी! आप निरन्तर मुझे प्रिय लगिये॥ १३० (ख)॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1046 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम।
English explanation
As a lustful person loves a woman, and a greedy person loves money—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कामिहि | कामी व्यक्ति को | to a lustful person |
| नारि | स्त्री | a woman |
| पिआरि | प्यारी | dear |
| जिमि | जैसे | as |
| लोभहि | लोभी को | to a greedy person |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| जिमि | जैसे | as |
| दाम | धन | money |
2 तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम।।130(ख)।।
English explanation
So may you, O Rama, lord of Raghu’s lineage, remain continually dear to me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिमि | वैसे ही | likewise |
| रघुनाथ | हे रघुकुल के स्वामी | O lord of Raghu’s lineage |
| निरंतर | सदा | continually |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| लागहु | लगें | may you be felt to be |
| मोहि | मुझे | to me |
| राम | हे राम | O Rama |
| ख | पद्य-संदर्भ चिह्न (ख) | verse reference marker (b) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- 7.13
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1046
- सहायक विषय
- रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय और फलस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 1044, 1047
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।