उत्तरकाण्ड · श्लोक · श्लोक
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे श्रीरघुवीर! मेरे समान कोई दीन नहीं है और आपके समान कोई दीनोंका हित करनेवाला नहीं है। ऐसा विचारकर हे रघुवंशमणि! मेरे जन्म-मरणके भयानक दु:खका हरण कर लीजिये॥ १३० (क)॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1046 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।
स्रोत अभिलेख 7.13 · पुस्तक पृ. 1044, 1047
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर।
English explanation
O Rama, hero of Raghu’s lineage, none is as helpless as I, and none befriends the helpless as you do.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मो | मेरे | me |
| सम | समान | like |
| दीन | दीन, असहाय | helpless |
| न | कोई नहीं | none |
| दीन | दीनों का | of the helpless |
| हित | हितैषी | benefactor |
| तुम्ह | आपके | you |
| समान | समान | equal to |
| रघुबीर | हे राम, रघुकुल के वीर | O Rama, hero of Raghu’s lineage |
2 अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।।130(क)।।
English explanation
Considering this, O jewel of Raghu’s lineage, remove the dreadful distress of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अस | ऐसा | thus |
| बिचारि | विचारकर | considering |
| रघुबंस | रघु के वंश के | of Raghu’s lineage |
| मनि | हे मणि, श्रेष्ठ राम | O jewel, Rama |
| हरहु | हर लीजिए | please remove |
| बिषम | भयंकर, कठिन | dreadful |
| भव | संसार की | of worldly existence |
| भीर | विपत्ति, संकट | distress, peril |
| क | पद्य-संदर्भ चिह्न (क) | verse reference marker (a) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- श्लोक
- स्रोत अभिलेख
- 7.13
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1046
- सहायक विषय
- रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय और फलस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 1044, 1047
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।