उत्तरकाण्ड · दोहा 107 (क) · दोहा
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।
कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥ १०७ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.107 · पुस्तक पृ. 1010, 1010
भावार्थ और शब्दार्थ
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1हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप।
शिव का भयानक शाप सुनकर गुरु ने हाहाकार किया।
English explanation
Hearing Shiva’s terrible curse, the guru cried out in anguish.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हाहाकार | दुःख और व्याकुलता की पुकार | a cry of anguish |
| कीन्ह | किया | made; uttered |
| गुर | गुरु ने | the guru |
| दारुन | भयानक | terrible |
| सुनि | सुनकर | having heard |
| सिव | शिव का | Shiva’s |
| साप | शाप | curse |
2कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप॥ १०७ (क)॥
मुझे काँपते देखकर गुरु के हृदय में अत्यंत संताप उत्पन्न हुआ।
English explanation
Seeing me trembling, profound distress arose in the guru’s heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कंपित | काँपता हुआ | trembling |
| मोहि | मुझे | me |
| बिलोकि | देखकर | having seen |
| अति | अत्यंत | very great; intense |
| उर | हृदय में | in the heart |
| उपजा | उत्पन्न हुआ | arose |
| परिताप | संताप; गहरा दुःख | distress; deep sorrow |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 107 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.107
- सहायक विषय
- गुरुजीका अपमान एवं शिवजीके शापकी बात सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1010, 1010
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।