उत्तरकाण्ड · दोहा 107 (ख) · दोहा
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥ १०७ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.107 · पुस्तक पृ. 1010, 1010
भावार्थ और शब्दार्थ
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1करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि।
ब्राह्मण गुरु ने प्रेमपूर्वक दंडवत प्रणाम करके शिव के सामने हाथ जोड़े।
English explanation
The Brahmin guru lovingly prostrated himself and joined his hands before Shiva.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| करि | करके | having performed |
| दंडवत | भूमि पर पूरा शरीर झुकाकर प्रणाम | full-body prostration |
| सप्रेम | प्रेमपूर्वक | with love |
| द्विज | ब्राह्मण गुरु | the Brahmin guru |
| सिव | शिव के | Shiva |
| सन्मुख | सामने | before; facing |
| कर | हाथ | hands |
| जोरि | जोड़कर | having joined together |
2बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥ १०७ (ख)॥
मेरी भयावह दशा समझकर गुरु भावावेग से रुंधे स्वर में विनती करने लगे।
English explanation
Understanding my dreadful plight, the guru began to plead in a voice choked with emotion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिनय | विनती | humble supplication |
| करत | करते हैं; करने लगे | makes; began making |
| गदगद | भावावेग से रुंधा हुआ | choked with emotion |
| स्वर | स्वर में | in a voice |
| समुझि | समझकर | having understood |
| घोर | भयावह | dreadful |
| गति | दशा; शाप से होने वाली दुर्गति | plight; dire fate under the curse |
| मोरि | मेरी | my |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 107 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.107
- सहायक विषय
- गुरुजीका अपमान एवं शिवजीके शापकी बात सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1010, 1010
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।