उत्तरकाण्ड · दोहा 108 (क) · दोहा/सोरठा
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.108 · पुस्तक पृ. 1011, 1013
भावार्थ और शब्दार्थ
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1सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु।
सर्वज्ञ शिव ने विनती सुनकर और ब्राह्मण का प्रेम देखकर—
English explanation
The all-knowing Shiva, hearing the supplication and seeing the Brahmin's loving devotion—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनि | सुनकर | having heard |
| बिनती | विनती | the supplication |
| सर्बग्य | सब कुछ जानने वाले | all-knowing |
| सिव | शिव | Shiva |
| देखि | देखकर | having seen |
| ब्रिप्र | ब्राह्मण का | the Brahmin's |
| अनुरागु | प्रेम और भक्ति | love and devotion |
2 पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु।।108(क)।।
—फिर मंदिर में आकाशवाणी हुई: ‘हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, वर माँगो।’
English explanation
—then a heavenly voice sounded in the temple: ‘O noble Brahmin, ask for a boon.’
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| मंदिर | मंदिर में | in the temple |
| नभबानी | आकाशवाणी | a heavenly voice |
| भइ | हुई | arose |
| द्विजबर | हे श्रेष्ठ ब्राह्मण | O noble Brahmin |
| बर | वरदान | a boon |
| मागु | माँगो | ask for |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse-reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 108 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.108
- सहायक विषय
- रुद्राष्टक · गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी आगेकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1011, 1013
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