उत्तरकाण्ड · दोहा 108 (ख) · दोहा/सोरठा
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.108 · पुस्तक पृ. 1011, 1013
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु।
यदि हे प्रभु, आप मुझ पर प्रसन्न हैं और हे नाथ, इस दीन पर आपका स्नेह है—
English explanation
If, O Lord, you are pleased with me and have affection for this humble, helpless one—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जौं | यदि | if |
| प्रसन्न | प्रसन्न हैं | are pleased |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| मो | मुझ | me |
| पर | पर | with |
| नाथ | हे स्वामी | O master |
| दीन | इस दीन जन | this humble, helpless person |
| पर | पर | for |
| नेहु | स्नेह है | have affection |
2 निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु।।108(ख)।।
—तो हे प्रभु, अपने चरणों की भक्ति देकर फिर मुझे दूसरा वर भी दीजिए।
English explanation
—then, O Lord, grant devotion to your feet, and afterward grant me a second boon as well.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| निज | अपने | your own |
| पद | चरणों की | to your feet |
| भगति | भक्ति | devotion |
| देइ | देकर | having granted |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| पुनि | फिर | then |
| दूसर | दूसरा | a second |
| बर | वरदान | boon |
| देहु | दीजिए | please grant |
| ख | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ख’ | verse-reference marker ‘ख’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 108 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.108
- सहायक विषय
- रुद्राष्टक · गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी आगेकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1011, 1013
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।