उत्तरकाण्ड · दोहा 108 (ग) · दोहा/सोरठा
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.108 · पुस्तक पृ. 1011, 1013
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान।
आपकी माया के वश में अज्ञानी जीव निरंतर भ्रमित होकर भटकता रहता है।
English explanation
Under the sway of your maya, the uncomprehending living being continually wanders in delusion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तव | आपकी | your |
| माया | मोह में डालने वाली माया के | deluding power, maya |
| बस | वश में | under the sway of |
| जीव | जीव | the living being |
| जड़ | अज्ञानी | uncomprehending |
| संतत | निरंतर | continually |
| फिरइ | भटकता रहता है | keeps wandering |
| भुलान | भ्रमित होकर | in delusion |
2 तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान।।108(ग)।।
हे प्रभु, कृपा के सागर भगवान, उस जीव पर क्रोध न कीजिए।
English explanation
O Lord, divine ocean of compassion, do not be angry with that being.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तेहि | उस जीव | that being |
| पर | पर | with |
| क्रोध | क्रोध | anger |
| न | न | not |
| करिअ | कीजिए | please show |
| प्रभु | हे प्रभु | O Lord |
| कृपा | कृपा के | of compassion |
| सिंधु | सागर | ocean |
| भगवान | हे भगवान | O divine Lord |
| ग | पद-संदर्भ का चिह्न ‘ग’ | verse-reference marker ‘ग’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 108 (ग)
- स्रोत अभिलेख
- 7.108
- सहायक विषय
- रुद्राष्टक · गुरुजीका शिवजीसे अपराध-क्षमापन, शापानुग्रह और काकभुशुण्डिकी आगेकी कथा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1011, 1013
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।