उत्तरकाण्ड · दोहा 104 (क) · दोहा
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं॥ १०४ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.104 · पुस्तक पृ. 1006, 1007
भावार्थ और शब्दार्थ
1हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं।
एआई-प्रारूप: हरि की माया से उत्पन्न दोष और गुण हरि के भजन के बिना नहीं मिटते।
English explanation
AI draft: Faults and virtues produced by Hari’s maya do not pass away without devotion to Hari.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरि | भगवान हरि की | of Lord Hari |
| माया | माया से | by maya, divine illusion |
| कृत | उत्पन्न | produced |
| दोष | दोष | faults |
| गुन | गुण | virtues |
| बिनु | बिना | without |
| हरि | भगवान हरि का | of Lord Hari |
| भजन | भजन; भक्तिपूर्वक स्मरण | devotion; worshipful remembrance |
| न | नहीं | not |
| जाहिं | मिटते हैं | pass away |
2भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं॥ १०४ (क)॥
एआई-प्रारूप: मन में ऐसा विचार करके, सभी कामनाएँ छोड़कर राम का भजन करना चाहिए।
English explanation
AI draft: Reflecting thus in the mind, one should relinquish all desires and worship Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भजिअ | भजन करना चाहिए | one should worship |
| राम | भगवान राम का | Lord Rama |
| तजि | छोड़कर | having relinquished |
| काम | कामनाएँ | desires |
| सब | सभी | all |
| अस | ऐसा | thus |
| बिचारि | विचार करके | having reflected |
| मन | मन | the mind |
| माहिं | में | in |
| क | दोहा १०४ के पहले भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the first part of couplet 104 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 104 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.104
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1006, 1007
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।