उत्तरकाण्ड · दोहा 3 (क) · दोहा
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥ ३ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.3 · पुस्तक पृ. 909, 910
भावार्थ और शब्दार्थ
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1हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत।
प्रसन्न भरत गुरु, परिजनों, छोटे भाई और ब्राह्मणों के समूह सहित चले।
English explanation
Joyful Bharata set out with his preceptor, family, younger brother, and a company of Brahmins.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरषित | प्रसन्न | joyful |
| गुर | गुरु वसिष्ठ | the preceptor, Vasishtha |
| परिजन | परिवार के लोग | family members |
| अनुज | छोटे भाई शत्रुघ्न | his younger brother, Shatrughna |
| भूसुर | ब्राह्मण | Brahmins |
| बृंद | समूह | company or group |
| समेत | सहित; साथ लेकर | together with |
2चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत॥ ३ (क)॥
मन में अत्यंत प्रेम लिए भरत कृपा के धाम श्रीराम की ओर चले।
English explanation
With deep love in his heart, Bharata went toward Rama, the abode of compassion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| चले | चल पड़े | set out |
| भरत | श्रीराम के भाई भरत | Bharata, Rama’s brother |
| मन | मन में | in his heart |
| प्रेम | प्रेम | love |
| अति | अत्यंत; बहुत अधिक | very great; deep |
| सन्मुख | की ओर; सामने | toward; facing |
| कृपानिकेत | कृपा के धाम श्रीराम | Rama, the abode of compassion |
| क | दोहा ३ का उपखंड-सूचक ‘क’ | reference marker for part (a) of verse 3 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 3 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.3
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 909, 910
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