उत्तरकाण्ड · दोहा 71 (ख) · दोहा
सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।
सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।
छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि॥ ७१ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.71 · पुस्तक पृ. 974, 974
भावार्थ और शब्दार्थ
1सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि।
वह माया श्रीराम की दासी है; उसे मिथ्या समझ लेने पर भी उससे मुक्ति नहीं मिलती—यह बात अगली पंक्ति में पूरी होती है।
English explanation
That Maya is a servant of Rama; even when understood to be unreal, she does not release one—a thought completed in the next line.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह माया | that Maya |
| दासी | सेविका | female servant |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर श्रीराम | Rama, the hero of Raghu’s lineage |
| कै | की | of |
| समुझें | समझ लेने पर | on understanding |
| मिथ्या | असत्य अथवा अवास्तविक | false or unreal |
| सोपि | वह भी; तब भी | even that; even then |
2छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि॥ ७१ (ख)॥
हे नाथ, राम की कृपा के बिना माया से छुटकारा नहीं मिलता; मैं यह बात दृढ़तापूर्वक कहता हूँ।
English explanation
O lord, one cannot escape Maya without Rama’s grace; I declare this firmly.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| छूट | छुटकारा मिलता | one gains release |
| न | नहीं | not |
| राम | श्रीराम की | of Rama |
| कृपा | अनुग्रह | grace |
| बिनु | बिना | without |
| नाथ | हे स्वामी | O lord |
| कहउँ | मैं कहता हूँ | I say |
| पद | पाँव | foot |
| रोपि | दृढ़ता से जमाकर | planting firmly |
| ख | दोहा ७१ के दूसरे भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the second part of verse 71 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 71 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.71
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 974, 974
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।