उत्तरकाण्ड · दोहा 41 · दोहा
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥ ४१॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.41 · पुस्तक पृ. 948, 949
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक।
हे तात, सुनो: माया से उत्पन्न गुण और दोष अनेक हैं।
English explanation
Listen, dear one: the virtues and faults produced by maya are many.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनहु | सुनो | listen |
| तात | हे प्रिय | dear one |
| माया | माया | maya, the power of illusion |
| कृत | से उत्पन्न | produced by |
| गुन | गुण | virtues |
| अरु | और | and |
| दोष | दोष | faults |
| अनेक | अनेक | many |
2गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक॥ ४१॥
गुण यह है कि इन दोनों—गुण और दोष—पर दृष्टि न रखी जाए; इन्हें देखते रहना अविवेक है।
English explanation
The virtue lies in not dwelling on either of these—virtues and faults; dwelling on them is a lack of discernment.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुन | सच्चा गुण | the virtue |
| यह | यह है कि | is this: that |
| उभय | दोनों—गुण और दोष | both—virtues and faults |
| न | न | not |
| देखिअहिं | देखे जाएँ | be regarded |
| देखिअ | देखना | regarding them |
| सो | वह | that |
| अबिबेक | अविवेक | lack of discernment |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 41
- स्रोत अभिलेख
- 7.41
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 948, 949
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।