उत्तरकाण्ड · दोहा 42 · दोहा
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।
जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥ ४२॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.42 · पुस्तक पृ. 949, 949
भावार्थ और शब्दार्थ
1जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान।
जीते-जी मुक्त और ब्रह्म में तल्लीन जन भी ध्यान छोड़कर भगवान के चरित सुनते हैं। (यह एआई-निर्मित अर्थ-प्रारूप है।)
English explanation
Those liberated while living and absorbed in Brahman leave meditation to listen to the Lord’s deeds. (This is an AI-generated draft interpretation.)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जीवनमुक्त | जीते-जी मुक्ति प्राप्त जन | those liberated while still living |
| ब्रह्मपर | ब्रह्म में परायण या तल्लीन जन | those devoted to or absorbed in Brahman |
| चरित | भगवान के चरित्र और लीलाएँ | the Lord’s deeds and exploits |
| सुनहिं | सुनते हैं | listen to |
| तजि | छोड़कर | leaving aside |
| ध्यान | ध्यान-साधना | meditation |
2जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान॥ ४२॥
जो हरि की कथा में प्रेम नहीं रखते, उनके हृदय पत्थर हैं।
English explanation
Those who have no love for the stories of Hari have hearts of stone.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जे | जो लोग | those who |
| हरि | भगवान हरि की | of Hari, the Lord |
| कथाँ | कथा में | in the stories |
| न | नहीं | not |
| करहिं | करते हैं या रखते हैं | have or cultivate |
| रति | प्रेम या अनुराग | love or affection |
| तिन्ह | उन लोगों | those people |
| के | के | of |
| हिय | हृदय | hearts |
| पाषान | पत्थर | stone |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 42
- स्रोत अभिलेख
- 7.42
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 949, 949
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।