उत्तरकाण्ड · दोहा 43 · दोहा
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥ ४३॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.43 · पुस्तक पृ. 950, 950
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ।
वह परलोक में दुःख पाता है और बार-बार सिर पीटकर पछताता है। (यह एआई-निर्मित अर्थ-प्रारूप है।)
English explanation
That person suffers in the world beyond and repents, beating his head again and again. (This is an AI-generated draft interpretation.)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह व्यक्ति | that person |
| परत्र | परलोक में | in the world beyond |
| दुख | दुःख | suffering |
| पावइ | पाता है | experiences |
| सिर | सिर | his head |
| धुनि | पीटकर | beating |
| धुनि | बार-बार पीटकर | beating repeatedly |
| पछिताइ | पछताता है | repents |
2कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोस लगाइ॥ ४३॥
वह काल, कर्म और ईश्वर पर व्यर्थ ही दोष लगाता है।
English explanation
He falsely lays the blame on time, karma, and God.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कालहि | काल पर | on time |
| कर्महि | कर्म पर | on karma |
| ईस्वरहि | ईश्वर पर | on God |
| मिथ्या | झूठा; निराधार | falsely; without grounds |
| दोस | दोष | blame |
| लगाइ | लगाता है | lays |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 43
- स्रोत अभिलेख
- 7.43
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता
- मुद्रित पृष्ठ
- 950, 950
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।