उत्तरकाण्ड · दोहा 44 · दोहा
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥ ४४॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.44 · पुस्तक पृ. 951, 951
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ।
एआई-प्रारूप: जो मनुष्य ऐसे साधन पाकर भी संसार-सागर से पार नहीं होता—
English explanation
AI draft: A person who, despite obtaining such means, does not cross the ocean of worldly existence—
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जो | जो | whoever |
| न | नहीं | does not |
| तरै | पार होता | crosses over |
| भव | संसाररूपी | of worldly existence |
| सागर | समुद्र | the ocean |
| नर | मनुष्य | a person |
| समाज | साधनों का समुच्चय | an assemblage of means |
| अस | ऐसा | such |
| पाइ | पाकर | having obtained |
2सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ॥ ४४॥
वह उपकार न मानने वाला मंदबुद्धि मनुष्य आत्मघाती की गति को प्राप्त होता है।
English explanation
That ungrateful, dull-minded person meets the fate of one who destroys oneself.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that person |
| कृत | किए हुए उपकार का | of the kindness done |
| निंदक | निंदा या अनादर करने वाला | one who disparages or disregards |
| मंदमति | मंदबुद्धि | dull-minded |
| आत्माहन | अपने को नष्ट करने वाले की | of one who destroys oneself |
| गति | गति या परिणति को | the fate or end |
| जाइ | प्राप्त होता है | comes to |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 44
- स्रोत अभिलेख
- 7.44
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता
- मुद्रित पृष्ठ
- 951, 951
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