उत्तरकाण्ड · दोहा 45 · दोहा
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥ ४५॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.45 · पुस्तक पृ. 952, 952
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि।
एआई-प्रारूप अर्थ: मैं हाथ जोड़कर सबको एक और गुप्त बात कहता हूँ।
English explanation
AI-draft meaning: With folded hands, I tell everyone one more confidential teaching.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| औरउ | और भी | one more; also |
| एक | एक | one |
| गुपुत | गुप्त; रहस्यपूर्ण | confidential; secret |
| मत | बात; उपदेश | teaching; counsel |
| सबहि | सबको | to everyone |
| कहउँ | मैं कहता हूँ | I say |
| कर | हाथ | hands |
| जोरि | जोड़कर | having folded; joining |
2संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि॥ ४५॥
एआई-प्रारूप अर्थ: शंकर के भजन के बिना मनुष्य मेरी भक्ति नहीं पाता।
English explanation
AI-draft meaning: Without worship of Shiva, a person does not attain devotion to me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| संकर | शंकर अर्थात् शिव का | of Shankara, Lord Shiva |
| भजन | भजन; भक्तिपूर्ण उपासना | devotional worship |
| बिना | के बिना | without |
| नर | मनुष्य | a person |
| भगति | भक्ति | devotion |
| न | नहीं | not |
| पावइ | पाता है; प्राप्त करता है | attains; obtains |
| मोरि | मेरी; मुझ राम के प्रति | my; directed toward me, Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 45
- स्रोत अभिलेख
- 7.45
- सहायक विषय
- श्रीरामजीका प्रजाको उपदेश (श्रीरामगीता), पुरवासियोंकी कृतज्ञता
- मुद्रित पृष्ठ
- 952, 952
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।