उत्तरकाण्ड · दोहा 12 (क) · दोहा
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥ १२ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.12 · पुस्तक पृ. 919, 919
भावार्थ और शब्दार्थ
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1वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस।
हे पक्षिराज गरुड़, वह शोभा और उस सभा का सुख कहकर व्यक्त नहीं किया जा सकता।
English explanation
O Garuda, king of birds, that splendor and the joy of the gathering cannot be expressed in words.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| वह | वह | that |
| सोभा | शोभा, सुंदरता | splendor; beauty |
| समाज | सभा, जुटा हुआ समुदाय | assembly; gathering |
| सुख | सुख, आनंद | joy |
| कहत | कहने में, वर्णन करने पर | in speaking; describing |
| न | नहीं | not |
| बनइ | संभव होता | is possible |
| खगेस | हे पक्षिराज गरुड़ | O Garuda, king of birds |
2बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस॥ १२ (क)॥
सरस्वती, शेष और वेद उसका वर्णन करते हैं; उस आनंद-रस को महादेव जानते हैं।
English explanation
Sarasvati, Shesha, and the Vedas describe it; Shiva knows the savor of that joy.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बरनहिं | वर्णन करते हैं | describe |
| सारद | सरस्वती, वाणी की देवी | Sarasvati, goddess of speech |
| सेष | शेष, दिव्य सर्पराज | Shesha, the divine serpent king |
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| सो | उस | that |
| रस | आनंद का रस, अनुभूति | the savor of joy; felt delight |
| जान | जानते हैं | knows |
| महेस | महेश, शिव | Shiva, the great Lord |
| क | पद्य-संदर्भ का उपखंड-चिह्न ‘क’ | verse-reference subdivision marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 12 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.12
- सहायक विषय
- राम-राज्याभिषेक, वेदस्तुति, शिवस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 919, 919
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