उत्तरकाण्ड · दोहा 3 (ग) · दोहा
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥ ३ (ग)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.3 · पुस्तक पृ. 909, 910
भावार्थ और शब्दार्थ
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1राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान।
पूर्णिमा के चंद्रमा-समान श्रीराम को देखकर नगररूपी समुद्र आनंदित हो उठा।
English explanation
Seeing Rama, likened to the full moon, the city, likened to the ocean, rejoiced.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राका | पूर्णिमा | the full-moon night |
| ससि | चंद्रमा | moon |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी श्रीराम | Rama, lord of the Raghu lineage |
| पुर | अयोध्या नगर | the city of Ayodhya |
| सिंधु | समुद्र | ocean |
| देखि | देखकर | on seeing |
| हरषान | आनंदित हुआ | rejoiced |
2बढ़्यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान॥ ३ (ग)॥
वह नगररूपी समुद्र कोलाहल करता हुआ उमड़ उठा, मानो स्त्रियाँ उसकी तरंगों के समान हों।
English explanation
That ocean-like city swelled with a tumult, as though the women were its waves.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बढ़्यो | बढ़ा; उमड़ उठा | swelled; surged |
| कोलाहल | उल्लास का शोर | joyful tumult |
| करत | करता हुआ | making; producing |
| जनु | मानो | as though |
| नारि | स्त्रियाँ | women |
| तरंग | लहरों के | waves |
| समान | समान | like; resembling |
| ग | दोहा ३ का उपखंड-सूचक ‘ग’ | reference marker for part (c) of verse 3 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 3 (ग)
- स्रोत अभिलेख
- 7.3
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 909, 910
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