उत्तरकाण्ड · दोहा 85 (ख) · दोहा
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।
कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥ ८५ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.85 · पुस्तक पृ. 987, 987
भावार्थ और शब्दार्थ
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1मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग।
हे काग, सुनो: भक्त मुझे सदा प्रिय हैं—ऐसा विचार करके,
English explanation
Listen, O crow: devotees are always dear to me. Keeping this in mind,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहि | मुझे | to me |
| भगत | भक्त | devotees |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| संतत | सदा | always |
| अस | ऐसा | this; thus |
| बिचारि | विचार करके | having considered; keeping in mind |
| सुनु | सुनो | listen |
| काग | हे कागभुशुण्डि, कौए के रूप वाले भक्त | O crow, the devotee Kakabhushundi |
2कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग॥ ८५ (ख)॥
शरीर, वचन और मन से मेरे चरणों में अटल प्रेम करो।
English explanation
Maintain unwavering love for my feet through body, speech, and mind.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कायँ | शरीर से | with the body |
| बचन | वचन से | through speech |
| मन | मन से | with the mind |
| मम | मेरे | my |
| पद | चरणों में | for the feet |
| करेसु | करो | maintain; practice |
| अचल | अटल | unwavering |
| अनुराग | प्रेम | love; loving devotion |
| ख | दोहा ८५ के दूसरे भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the second part of couplet 85 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 85 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.85
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 987, 987
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