उत्तरकाण्ड · दोहा 85 (क) · दोहा
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।
जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥ ८५ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.85 · पुस्तक पृ. 987, 987
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि।
माया से उत्पन्न कोई भी भ्रम अब तुम्हें नहीं व्यापेगा।
English explanation
No delusion arising from maya will affect you any longer.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| माया | माया से | from maya, the power of illusion |
| संभव | उत्पन्न | arising |
| भ्रम | भ्रम | delusions |
| सब | सभी | all |
| अब | अब | now |
| न | नहीं | not |
| ब्यापिहहिं | व्यापेंगे; प्रभावित करेंगे | will affect or envelop |
| तोहि | तुम्हें | you |
2जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि॥ ८५ (क)॥
मुझे अनादि, अजन्मा, गुणों से परे और सद्गुणों का भंडार ब्रह्म जानो।
English explanation
Know me as Brahman, beginningless and unborn, beyond the qualities of nature and a treasury of virtues.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जानेसु | जानो | know; recognize |
| ब्रह्म | परम तत्त्व ब्रह्म | Brahman, the supreme reality |
| अनादि | जिसका कोई आरंभ नहीं | beginningless |
| अज | अजन्मा | unborn |
| अगुन | प्रकृति के गुणों से परे | beyond the qualities of nature |
| गुनाकर | सद्गुणों का भंडार | a treasury of virtues |
| मोहि | मुझे | me |
| क | दोहा ८५ के पहले भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the first part of couplet 85 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 85 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.85
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 987, 987
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।