उत्तरकाण्ड · दोहा 53 · दोहा
बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।
बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥ ५३॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.53 · पुस्तक पृ. 959, 959
भावार्थ और शब्दार्थ
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1बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह।
दृढ़ वैराग्य, ज्ञान और अनुभूत ज्ञान तथा राम के चरणों में अत्यंत प्रेम है।
English explanation
There are steadfast dispassion, knowledge, realized understanding, and deep love for Rama’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बिरति | वैराग्य; विषयों से अनासक्ति | dispassion; detachment from worldly attractions |
| ग्यान | ज्ञान; तत्त्व की समझ | knowledge; understanding of truth |
| बिग्यान | अनुभूत ज्ञान; प्रत्यक्ष आत्मिक बोध | realized knowledge; direct spiritual understanding |
| दृढ़ | दृढ़; अटल | firm; steadfast |
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| अति | अत्यंत | exceedingly |
| नेह | प्रेम | love |
2बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह॥ ५३॥
कौए के शरीर में रघुपति की ऐसी भक्ति होने पर मुझे अत्यंत संदेह है।
English explanation
I have great doubt about such devotion to Rama in the body of a crow.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बायस | कौए का | of a crow |
| तन | शरीर में | in the body |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम की | to Rama, lord of the Raghu lineage |
| भगति | भक्ति | devotion |
| मोहि | मुझे | to me |
| परम | अत्यंत; बहुत बड़ा | very great |
| संदेह | संदेह; शंका | doubt |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 53
- स्रोत अभिलेख
- 7.53
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 959, 959
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