उत्तरकाण्ड · दोहा 52 (ख) · दोहा
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।
श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.52 · पुस्तक पृ. 958, 958
भावार्थ और शब्दार्थ
1नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर।
AI-प्रारूप: हे नाथ! आपके मुखरूपी चंद्रमा से रघुवीर राम की कथारूपी अमृतधारा झर रही है।
English explanation
AI draft: O master, from the moon of your mouth flows the nectar of the story of Rama, hero of Raghu's lineage.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे स्वामी | O master |
| तवानन | आपका मुख | your mouth |
| ससि | चंद्रमा; मुख का रूपक | moon, a metaphor for the mouth |
| स्रवत | झर रहा है | is flowing |
| कथा | कथा | story |
| सुधा | अमृत; कथा का रूपक | nectar, a metaphor for the story |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर श्रीराम की | of Rama, hero of Raghu's lineage |
2श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर॥ ५२ (ख)॥
AI-प्रारूप: हे धीरबुद्धि! कानों के दोने से उस कथामृत को पीकर भी मेरा मन तृप्त नहीं होता।
English explanation
AI draft: O one of steady understanding, even after drinking that nectar through the cups of my ears, my mind is not sated.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्रवन | कान | ears |
| पुटन्हि | दोनों से; प्यालों से | through the cups |
| मन | मेरा मन | my mind |
| पान | पीना | drinking |
| करि | करके | having done |
| नहिं | नहीं | not |
| अघात | तृप्त होता; अघाता | becomes sated |
| मतिधीर | हे धीरबुद्धि | O one of steady understanding |
| ख | दोहा ५२ के दूसरे भाग का संदर्भ-चिह्न | reference marker for the second part of verse 52 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 52 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.52
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 958, 958
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।