उत्तरकाण्ड · दोहा 36 · दोहा
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.36 · पुस्तक पृ. 944, 944
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह।
हे नाथ, मुझे कोई संदेह नहीं है; सपने में भी न शोक है, न मोह।
English explanation
O Lord, I have no doubt whatsoever; even in dreams, I have neither sorrow nor delusion.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| नाथ | हे नाथ! | O Lord! |
| न | नहीं | not |
| मोहि | मुझे | to me |
| संदेह | संदेह | doubt |
| कछु | कुछ भी | any whatsoever |
| सपनेहुँ | सपने में भी | even in dreams |
| सोक | शोक; दुःख | sorrow; grief |
| न | नहीं | not |
| मोह | मोह; भ्रमपूर्ण आसक्ति | delusion; delusive attachment |
2केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह॥ ३६॥
हे कृपा और आनंद के पुंज, यह केवल आपकी ही कृपा का फल है।
English explanation
O embodiment of compassion and bliss, this is due solely to your grace.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| केवल | केवल; मात्र | solely; only |
| कृपा | कृपा | grace |
| तुम्हारिहि | आपकी ही | yours alone |
| कृपानंद | कृपा और आनंद के | of compassion and bliss |
| संदोह | हे पुंज; हे भंडार | O embodiment; O treasury |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 36
- स्रोत अभिलेख
- 7.36
- सहायक विषय
- हनुमान्जीके द्वारा भरतजीका प्रश्न और श्रीरामजीका उपदेश
- मुद्रित पृष्ठ
- 944, 944
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।