उत्तरकाण्ड · दोहा 35 · दोहा
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.35 · पुस्तक पृ. 943, 944
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ।
एआई प्रारूप: बार-बार स्तुति करके और प्रेमपूर्वक सिर नवाकर,
English explanation
AI draft: Having offered praise repeatedly and bowed their heads with love,
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बार | बार; अगले ‘बार’ के साथ बार-बार | time; with the next word, repeatedly |
| बार | बार; पिछले ‘बार’ के साथ बार-बार | time; with the preceding word, repeatedly |
| अस्तुति | स्तुति | praise |
| करि | करके | having offered |
| प्रेम | प्रेम | love |
| सहित | के साथ | with |
| सिरु | सिर | heads |
| नाइ | नवाकर | having bowed |
2ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ॥ ३५॥
एआई प्रारूप: सनक आदि कुमार अत्यंत मनोवांछित वर पाकर ब्रह्मा के लोक चले गए।
English explanation
AI draft: Having received the boon they deeply desired, Sanaka and the other sages went to Brahma’s abode.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| ब्रह्म | ब्रह्मा का | Brahma’s, the creator’s |
| भवन | निवास-स्थान; लोक | abode; realm |
| सनकादि | सनक और उनके समान अन्य कुमार ऋषि | Sanaka and the other Kumara sages |
| गे | गए | went |
| अति | अत्यंत | deeply; exceedingly |
| अभीष्ट | मनोवांछित | desired |
| बर | वरदान | boon |
| पाइ | पाकर | having received |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 35
- स्रोत अभिलेख
- 7.35
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 943, 944
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।