उत्तरकाण्ड · दोहा 34 · दोहा
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥ ३४॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.34 · पुस्तक पृ. 942, 943
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम।
हे परम आनंदस्वरूप, कृपा के धाम और मन की कामनाओं को पूर्ण करने वाले प्रभु!
English explanation
O Lord, supreme bliss, abode of compassion, and fulfiller of the heart’s desires!
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| परमानंद | परम आनंदस्वरूप प्रभु | Lord who is supreme bliss |
| कृपायतन | कृपा के धाम | abode of compassion |
| मन | मन की | of the heart |
| परिपूरन | पूर्ण करने वाले | fulfilling |
| काम | कामनाएँ | desires |
2प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम॥ ३४॥
हे श्रीराम! हमें प्रेममयी, कभी न मिटने वाली भक्ति दीजिए।
English explanation
O Shri Rama, grant us loving devotion that never fades.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| प्रेम | प्रेममयी | loving |
| भगति | भक्ति | devotion |
| अनपायनी | कभी न मिटने वाली | unfailing; never fading |
| देहु | दीजिए | please grant |
| हमहि | हमें ही | to us |
| श्रीराम | हे श्रीराम, प्रभु राम | O Shri Rama, Lord Rama |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 34
- स्रोत अभिलेख
- 7.34
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 942, 943
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।