उत्तरकाण्ड · दोहा 74 (ख) · दोहा
तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
मूल पाठ
तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥ ७४ (ख)॥
स्रोत अभिलेख 7.74 · पुस्तक पृ. 977, 977
भावार्थ
मूल पाठ के बादउसी प्रकार श्रीरघुनाथजी अपने दासका अभिमान उसके हितके लिये हर लेते हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि ऐसे प्रभुको भ्रम त्यागकर क्यों नहीं भजते॥ ७४ (ख)॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 978 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तिमि रघुपति निज दास कर हरहिं मान हित लागि।
English explanation
Likewise, Rama removes his servant’s pride for the servant’s own good.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तिमि | उसी प्रकार | likewise |
| रघुपति | रघुकुल के स्वामी श्रीराम | Rama, lord of the Raghu lineage |
| निज | अपने | his own |
| दास | सेवक; भक्त | servant; devotee |
| कर | का | of |
| हरहिं | हर लेते हैं; दूर करते हैं | removes |
| मान | अभिमान | pride |
| हित | भलाई | welfare |
| लागि | के लिए | for the sake of |
2तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि॥ ७४ (ख)॥
English explanation
O Tulsidas, why do you not abandon delusion and worship such a Lord?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुलसिदास | हे तुलसीदास, कवि का आत्म-संबोधन | O Tulsidas, the poet addressing himself |
| ऐसे | ऐसे | such |
| प्रभुहि | प्रभु को | the Lord |
| कस | क्यों | why |
| न | नहीं | not |
| भजहु | भजन करते हो; आराधना करते हो | you worship |
| भ्रम | भ्रम; मोह | delusion |
| त्यागि | छोड़कर | having abandoned |
| ख | दोहा-खंड का संदर्भ-चिह्न (ख) | verse-section reference marker (ख) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 74 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.74
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 978
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 977, 977
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।