उत्तरकाण्ड · दोहा 125 (क) · दोहा
तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।
तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर॥ १२५ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.125 · पुस्तक पृ. 1040, 1040
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर।
एआई प्रारूप: धीरबुद्धि गरुड़ ने प्रेमपूर्वक उनके (काकभुशुंडि के) चरणों में सिर झुकाकर प्रणाम किया।
English explanation
AI draft: Steady-minded Garuda lovingly bowed his head at Kakabhushundi’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तासु | उनके (काकभुशुंडि के) | his (Kakabhushundi’s) |
| चरन | चरणों में | at the feet |
| सिरु | सिर | head |
| नाइ | झुकाकर | having bowed |
| करि | करके | having done so |
| प्रेम | प्रेम | love |
| सहित | सहित; साथ | with |
| मतिधीर | धीरबुद्धि (गरुड़) | steady-minded (Garuda) |
2गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर॥ १२५ (क)॥
एआई प्रारूप: तब गरुड़ हृदय में श्रीराम को रखकर बैकुंठ गए।
English explanation
AI draft: Then Garuda went to Vaikuntha, keeping Rama in his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गयउ | गए | went |
| गरुड़ | गरुड़, विष्णु के पक्षीराज वाहन | Garuda, Vishnu’s bird mount |
| बैकुंठ | बैकुंठ, विष्णु का धाम | Vaikuntha, Vishnu’s abode |
| तब | तब | then |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| राखि | रखकर | keeping |
| रघुबीर | रघुकुल के वीर श्रीराम को | Rama, the hero of Raghu’s lineage |
| क | पद-संदर्भ चिह्न (क) | verse reference marker (क) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 125 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.125
- सहायक विषय
- रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय और फलस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 1040, 1040
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।