उत्तरकाण्ड · दोहा 48 · दोहा
तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥ ४८॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.48 · पुस्तक पृ. 954, 955
भावार्थ और शब्दार्थ
1तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान।
AI-प्रारूप: तब मैंने हृदय में विचार किया कि योग, यज्ञ, व्रत और दान जिस फल के लिए किए जाते हैं…
English explanation
AI draft: Then I reflected in my heart: the fruit for which yoga, sacrifices, vows, and charity are undertaken…
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| मैं | मैंने | I |
| हृदयँ | हृदय में | in my heart |
| बिचारा | विचार किया | reflected |
| जोग | योग-साधना | yogic practice |
| जग्य | यज्ञ | ritual sacrifices |
| ब्रत | व्रत | religious vows |
| दान | दान | charitable giving |
2जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन॥ ४८॥
जिस फल के लिए ये किए जाते हैं, वह मैं प्राप्त करूँगा; इसके समान दूसरा कोई धर्म नहीं है।
English explanation
I shall obtain the fruit for which these are undertaken; there is no other religious path equal to this.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जा | जिस फल के | which fruit |
| कहुँ | लिए | for |
| करिअ | किए जाते हैं | are undertaken |
| सो | वह फल | that fruit |
| पैहउँ | मैं पाऊँगा | I shall obtain |
| धर्म | धर्म या धार्मिक साधन | religious path or practice |
| न | नहीं | not |
| एहि | इसके | this |
| सम | समान | equal to |
| आन | अन्य | other |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 48
- स्रोत अभिलेख
- 7.48
- सहायक विषय
- श्रीराम-वसिष्ठ-संवाद, श्रीरामजीका भाइयोंसहित अमराईमें जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 954, 955
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।