उत्तरकाण्ड · दोहा 24 · दोहा
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
राम पदारबिंद रति सुभावहि खोइ॥ २४॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.24 · पुस्तक पृ. 933, 934
भावार्थ और शब्दार्थ
1जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ।
एआई प्रारूप: देवता जिसका कृपापूर्ण कटाक्ष चाहते हैं, राम उसकी ओर भी नहीं देखते।
English explanation
AI draft: The gods seek her gracious glance, yet Rama does not look toward her.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जासु | जिसका | whose |
| कृपा | कृपा का; अनुग्रहपूर्ण | gracious; of favor |
| कटाच्छु | कटाक्ष; पार्श्व से डाली गई दृष्टि | glance; sidelong look |
| सुर | देवता | the gods |
| चाहत | चाहते हैं | desire; seek |
| चितव | देखते हैं; दृष्टि डालते हैं | look toward |
| न | नहीं | not |
| सोइ | उसी को; उसकी ओर | at that very one; toward her |
2राम पदारबिंद रति सुभावहि खोइ॥ २४॥
एआई प्रारूप: वह राम के चरण-कमलों में प्रेम रखकर अपना स्वभाव खो देती है। दिए गए पाठ में प्रेम करने की क्रिया स्पष्ट नहीं है, इसलिए वाक्य-संबंध अनुमानित है।
English explanation
AI draft: Through love for Rama’s lotus feet, she loses her own habitual nature. The supplied text does not explicitly state the act of loving, so the sentence connection is inferred.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| पदारबिंद | चरण-कमलों में | in the lotus feet |
| रति | प्रेम; अनुराग | love; devotion |
| सुभावहि | अपने स्वभाव को ही | her own habitual nature itself |
| खोइ | खो देती है; त्याग देती है | loses; gives up |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 24
- स्रोत अभिलेख
- 7.24
- सहायक विषय
- रामराज्यका वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 933, 934
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।