उत्तरकाण्ड · दोहा 106 (क) · दोहा
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।
गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥ १०६ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.106 · पुस्तक पृ. 1008, 1009
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम।
एक बार मैं शिव के मंदिर में शिव-नाम जप रहा था। (एआई-निर्मित अर्थ-प्रारूप)
English explanation
Once I was chanting Shiva’s name in his temple. (AI-generated interpretive draft)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| एक | एक | one |
| बार | बार; अवसर | occasion; time |
| हर | शिव का | of Shiva |
| मंदिर | मंदिर में | in the temple |
| जपत | जपता हुआ | chanting |
| रहेउँ | मैं रहा था | I was |
| सिव | शिव का | Shiva’s |
| नाम | नाम | name |
2गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम॥ १०६ (क)॥
गुरु आए, पर अभिमान के कारण मैंने उठकर प्रणाम नहीं किया।
English explanation
My guru arrived, but out of pride I did not rise and bow to him.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुर | गुरु | the guru; spiritual teacher |
| आयउ | आए | arrived |
| अभिमान | अभिमान | pride |
| तें | के कारण | because of |
| उठि | उठकर | rising; getting up |
| नहिं | नहीं | not |
| कीन्ह | किया | performed; did |
| प्रनाम | प्रणाम | a respectful bow |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse-reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 106 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.106
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1008, 1009
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।