उत्तरकाण्ड · सोरठा 105 (ख) · सोरठा
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।
मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥ १०५ (ख)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.105 · पुस्तक पृ. 1007, 1008
भावार्थ और शब्दार्थ
AI प्रारूपशब्दार्थ और भावार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। इन्हें अंतिम व्याख्या न मानें।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम।
एआई प्रारूप: मेरे आचरण को देखकर दुखी हुए गुरु मुझे प्रतिदिन समझाते थे।
English explanation
AI draft: Distressed by my conduct, my teacher instructed me every day.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गुर | गुरु | the spiritual teacher |
| नित | प्रतिदिन | daily |
| मोहि | मुझे | me |
| प्रबोध | समझाते थे | instructed or counseled |
| दुखित | दुखी | distressed |
| देखि | देखकर | on seeing |
| आचरन | आचरण | conduct |
| मम | मेरा | my |
2मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई॥ १०५ (ख)॥
एआई प्रारूप: मुझे बहुत क्रोध होता था; क्या किसी दंभी को नीति की सीख अच्छी लगती है?
English explanation
AI draft: Great anger arose in me; does sound moral counsel ever please a conceited person?
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मोहि | मुझमें; मुझे | in me; to me |
| उपजइ | उत्पन्न होता है | arises |
| अति | बहुत अधिक | very great |
| क्रोध | क्रोध | anger |
| दंभिहि | दंभी व्यक्ति को | to a conceited person |
| नीति | नीति की सीख | sound moral counsel |
| कि | क्या | does; rhetorical question marker |
| भावई | अच्छी लगती है | is pleasing |
| ख | पद का संदर्भ-चिह्न (ख) | verse reference marker (ख) |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- सोरठा 105 (ख)
- स्रोत अभिलेख
- 7.105
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1007, 1008
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।