उत्तरकाण्ड · दोहा 16 · दोहा
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।
सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥ १६॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.16 · पुस्तक पृ. 926, 926
भावार्थ और शब्दार्थ
1अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम।
हे सब सखाओ, अब घर जाओ और दृढ़ नियम से मेरा भजन करते रहो। (यह एआई-निर्मित अर्थ का प्रारूप है।)
English explanation
All my friends, now go home and continue worshipping me with steadfast discipline. (This is an AI-drafted interpretation.)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| गृह | घर | home |
| जाहु | जाओ | go |
| सखा | हे मित्रो | O friends |
| सब | सभी | all |
| भजेहु | भजन करते रहो | continue worshipping |
| मोहि | मुझे; मेरा | me |
| दृढ़ | अटल; दृढ़ | steadfast |
| नेम | नियम से; नियमित साधना के साथ | with disciplined observance |
2सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम॥ १६॥
मुझे सदा सर्वव्यापी और सबका हित करने वाला जानकर मुझसे अत्यंत प्रेम करो।
English explanation
Knowing me to be always present everywhere and the benefactor of all, love me deeply.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सदा | सदैव | always |
| सर्बगत | सबमें और सर्वत्र विद्यमान | present in all and everywhere |
| सर्बहित | सबका हित करने वाला | the benefactor of all |
| जानि | जानकर; समझकर | knowing; recognizing |
| करेहु | करो | do; show |
| अति | बहुत; अत्यंत | deeply; exceedingly |
| प्रेम | प्रेम | love |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 16
- स्रोत अभिलेख
- 7.16
- सहायक विषय
- वानरोंकी और निषादकी विदाई
- मुद्रित पृष्ठ
- 926, 926
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।