उत्तरकाण्ड · छंद · छंद
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।
मूल पाठ
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥
स्रोत अभिलेख 7.5 · पुस्तक पृ. 911, 912
भावार्थ
मूल पाठ के बादकृपानिधान श्रीरामजी भरतजीसे कुशल पूछते हैं; परन्तु आनन्दवश भरतजीके मुखसे वचन शीघ्र नहीं निकलते। [शिवजीने कहा—] हे पार्वती! सुनो, वह सुख (जो उस समय भरतजीको मिल रहा था) वचन और मनसे परे है; उसे वही जानता है जो उसे पाता है। [भरतजीने कहा—] हे कोसलनाथ! आपने आत्र्त (दु:खी) जानकर दासको दर्शन दिये, इससे अब कुशल है। विरहसमुद्रमें डूबते हुए मुझको कृपानिधानने हाथ पकड़कर बचा लिया!॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 912 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई।
English explanation
Rama, the treasure of compassion, asks after Bharata's well-being, but words do not readily come to Bharata.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बूझत | पूछते हैं | asks |
| कृपानिधि | कृपा के भंडार राम | Rama, the treasure of compassion |
| कुसल | कुशल-क्षेम | well-being |
| भरतहि | भरत से; भरत को | of Bharata; to Bharata |
| बचन | शब्द | words |
| बेगि | शीघ्र, तुरंत | readily, at once |
| न | नहीं | not |
| आवई | आते हैं | come |
2सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई॥
English explanation
Listen, Parvati! That joy is beyond speech and mind; only one who experiences it knows it.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुनु | सुनो | listen |
| सिवा | हे पार्वती, शिव की पत्नी | O Parvati, Shiva's consort |
| सो | वह | that |
| सुख | सुख, आनंद | joy |
| बचन | वाणी | speech |
| मन | मन | mind |
| ते | से | from; beyond |
| भिन्न | पृथक, यहाँ परे | apart, here beyond |
| जान | जानता है | knows |
| जो | जो व्यक्ति | the one who |
| पावई | प्राप्त करता, अनुभव करता है | attains, experiences |
3अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो।
English explanation
O lord of Kosala, all is well now: knowing your servant's distress, you have granted him the sight of you.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| अब | अब | now |
| कुसल | कुशल है | all is well |
| कौसलनाथ | हे कोसल के स्वामी राम | O Rama, lord of Kosala |
| आरत | दुःखी, व्याकुल | distressed |
| जानि | जानकर | knowing |
| जन | अपने सेवक को | your servant |
| दरसन | दर्शन, अपने सम्मुख होने का अवसर | the sight of you, your presence |
| दियो | दिया | granted |
4बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो॥
English explanation
O treasure of compassion, you took me by the hand as I was drowning in the ocean of separation.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| बूड़त | डूबते हुए | drowning |
| बिरह | वियोग के | of separation |
| बारीस | समुद्र में | in the ocean |
| कृपानिधान | हे कृपा के भंडार राम | O Rama, treasure of compassion |
| मोहि | मुझे | me |
| कर | हाथ | hand |
| गहि | पकड़कर | grasping |
| लियो | थाम लिया | took hold of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- छंद
- स्रोत अभिलेख
- 7.5
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 912
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 911, 912
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।