उत्तरकाण्ड · दोहा 5 · दोहा
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥ ५॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.5 · पुस्तक पृ. 911, 912
भावार्थ और शब्दार्थ
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1पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ।
फिर प्रभु राम हर्षित होकर शत्रुघ्न को हृदय से लगाकर मिले।
English explanation
Then Lord Rama joyfully met Shatrughna, clasping him to his heart.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| पुनि | फिर | then |
| प्रभु | प्रभु राम | Lord Rama |
| हरषि | हर्षित होकर | joyfully |
| सत्रुहन | राम के छोटे भाई शत्रुघ्न से | Shatrughna, Rama's younger brother |
| भेंटे | मिले, आलिंगन किया | met, embraced |
| हृदयँ | हृदय से, छाती से | to his heart, against his chest |
| लगाइ | लगाकर | having clasped |
2लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ॥ ५॥
तब लक्ष्मण और भरत, दोनों भाई, अत्यंत प्रेम से मिले।
English explanation
Then the two brothers, Lakshmana and Bharata, met with the deepest love.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लछिमन | राम के छोटे भाई लक्ष्मण | Lakshmana, Rama's younger brother |
| भरत | राम के छोटे भाई भरत | Bharata, Rama's younger brother |
| मिले | मिले | met |
| तब | तब | then |
| परम | अत्यंत, सर्वोच्च | deepest, utmost |
| प्रेम | प्रेम से | with love |
| दोउ | दोनों | both |
| भाइ | भाई | brothers |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 5
- स्रोत अभिलेख
- 7.5
- सहायक विषय
- भरत-विरह तथा भरत-हनुमान्-मिलन, अयोध्यामें आनन्द
- मुद्रित पृष्ठ
- 911, 912
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