उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
मूल पाठ
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।
स्रोत अभिलेख 7.127 · पुस्तक पृ. 1042, 1042
भावार्थ
मूल पाठ के बादवह धन धन्य है जिसकी पहली गति होती है (जो दान देनेमें व्यय होता है)। वही बुद्धि धन्य और परिपक्व है जो पुण्यमें लगी हुई है। वही घड़ी धन्य है जब सत्संग हो और वही जन्म धन्य है जिसमें ब्राह्मणकी अखण्ड भक्ति हो॥ ४॥ [धनकी तीन गतियाँ होती हैं—दान, भोग और नाश। दान उत्तम है, भोग मध्यम है और नाश नीच गति है। जो पुरुष न देता है, न भोगता है, उसके धनकी तीसरी गति होती है।]
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1042 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सो धन धन्य प्रथम गति जाकी। धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी।।
English explanation
Blessed is the wealth put to its best use, charitable giving; blessed and mature is the understanding devoted to meritorious deeds.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह | that |
| धन | धन | wealth |
| धन्य | धन्य | blessed |
| प्रथम | पहली और सर्वोत्तम | first and best |
| गति | उपयोग की परिणति—दान | disposition—charitable giving |
| जाकी | जिसकी | whose |
| धन्य | धन्य | blessed |
| पुन्य | पुण्यकर्म में | in meritorious deeds |
| रत | लगी हुई | engaged |
| मति | बुद्धि | understanding |
| सोइ | वही | that alone |
| पाकी | परिपक्व | mature |
2 धन्य घरी सोइ जब सतसंगा। धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा।।
English explanation
Blessed is the hour spent in the company of the good; blessed is the life marked by unwavering reverence and devotion to Brahmins.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| धन्य | धन्य | blessed |
| घरी | घड़ी या समय | hour or moment |
| सोइ | वही | that alone |
| जब | जब | when |
| सतसंगा | सज्जनों और संतों की संगति हो | there is company of the good and saintly |
| धन्य | धन्य | blessed |
| जन्म | जन्म या जीवन | birth or life |
| द्विज | ब्राह्मणों के प्रति | toward Brahmins |
| भगति | श्रद्धाभक्ति | reverent devotion |
| अभंगा | अटूट | unbroken |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.127
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1042
- सहायक विषय
- रामायण-माहात्म्य, तुलसी-विनय और फलस्तुति
- मुद्रित पृष्ठ
- 1042, 1042
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।