उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।
मूल पाठ
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
स्रोत अभिलेख 7.1 · पुस्तक पृ. 1002, 1002
भावार्थ
मूल पाठ के बादशूद्र नाना प्रकारके जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन (व्यासगद्दी) पर बैठकर पुराण कहते हैं। सब मनुष्य मनमाना आचरण करते हैं। अपार अनीतिका वर्णन नहीं किया जा सकता॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1002 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।।
English explanation
Shudras perform various recitations, austerities, and vows, and sit on elevated seats to expound the Puranas.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सूद्र | शूद्र; वर्ण-व्यवस्था का एक वर्ग | Shudras, a class in the varna hierarchy |
| करहिं | करते हैं | perform |
| जप | मंत्र या नाम की पुनरावृत्ति | repeated sacred recitation |
| तप | तपस्या | austerities |
| ब्रत | धार्मिक व्रत | religious vows |
| नाना | अनेक प्रकार के | of various kinds |
| बैठि | बैठकर | sitting |
| बरासन | श्रेष्ठ या ऊँचे आसन पर | on an elevated or distinguished seat |
| कहहिं | कहते हैं; कथा सुनाते हैं | recount; expound |
| पुराना | पुराणों की कथा | the Puranas |
2 सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
English explanation
Everyone follows self-invented practices; the boundless wrongdoing cannot be described.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सब | सभी | all |
| नर | लोग | people |
| कल्पित | मन से गढ़े हुए | self-invented |
| करहिं | करते हैं | practise |
| अचारा | आचार; व्यवहार और रीति | conduct and practices |
| जाइ | जा सकता है | can be |
| न | नहीं | not |
| बरनि | वर्णन किया | described |
| अनीति | अन्याय और अनुचित आचरण | wrongdoing and improper conduct |
| अपारा | अपार; असीम | boundless |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.1
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1002
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1002, 1002
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।