उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दजो अभिमानी जीव देवताओं और वेदोंकी निन्दा करते हैं, वे रौरव नरकमें पड़ते हैं। संतोंकी निन्दामें लगे हुए लोग उल्लू होते हैं, जिन्हें मोहरूपी रात्रि प्रिय होती है और ज्ञानरूपी सूर्य जिनके लिये बीत गया (अस्त हो गया) रहता है॥ १३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1034 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।
स्रोत अभिलेख 7.121 · पुस्तक पृ. 1032, 1035
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी। रौरव नरक परहिं ते प्रानी।।
English explanation
Those arrogant beings who slander the gods and Vedas fall into the hell called Raurava.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुर | देवताओं के | of the gods |
| श्रुति | वेदों के | of the Vedas |
| निंदक | निंदक | slanderers |
| जे | जो | who |
| अभिमानी | अभिमानी | arrogant |
| रौरव | रौरव नामक | called Raurava |
| नरक | नरक में | into hell |
| परहिं | पड़ते हैं | fall |
| ते | वे | those |
| प्रानी | प्राणी | beings |
2 होहिं उलूक संत निंदा रत। मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत।।
English explanation
Those devoted to slandering saints become owls; they love the night of delusion, with the sun of knowledge gone from them.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| होहिं | होते हैं | become |
| उलूक | उल्लू | owls |
| संत | संतों की | of saints |
| निंदा | निंदा में | in slander |
| रत | लगे हुए | absorbed |
| मोह | मोह की | of delusion |
| निसा | रात | night |
| प्रिय | प्रिय | dear |
| ग्यान | ज्ञान का | of knowledge |
| भानु | सूर्य | sun |
| गत | चला गया, अनुपस्थित | gone, absent |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.121
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1034
- सहायक विषय
- गरुड़जीके सात प्रश्न तथा काकभुशुण्डिके उत्तर
- मुद्रित पृष्ठ
- 1032, 1035
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।