उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दअरे मूर्ख! तेरे हृदयमें अपने पक्षका बड़ा भारी हठ है, अत: तू शीघ्र चाण्डाल पक्षी (कौआ) हो जा। मैंने आनन्दके साथ मुनिके शापको सिरपर चढ़ा लिया। उससे मुझे न कुछ भय हुआ, न दीनता ही आयी॥ ८॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1019 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
स्रोत अभिलेख 7.112 · पुस्तक पृ. 1018, 1019
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला। सपदि होहि पच्छी चंडाला।।
English explanation
Fool, attachment to your own position looms large in your heart; become at once an outcast among birds—a crow! (The reading ‘तब’ is uncertain here.)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सठ | हे मूर्ख | O fool |
| स्वपच्छ | अपने पक्ष का आग्रह | attachment to your own position |
| तब | तेरे | your |
| हृदयँ | हृदय में | in the heart |
| बिसाला | बहुत बड़ा | very great |
| सपदि | तुरंत | at once |
| होहि | हो जा | become |
| पच्छी | पक्षी | a bird |
| चंडाला | चांडाल, यहाँ कौआ | an outcast, here a crow |
2 लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई। नहिं कछु भय न दीनता आई।।
English explanation
I respectfully accepted the curse; neither fear nor dejection arose in me.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| लीन्ह | स्वीकार किया | accepted |
| श्राप | शाप | the curse |
| मैं | मैंने | I |
| सीस | सिर पर | on my head |
| चढ़ाई | चढ़ाकर | placing |
| नहिं | नहीं | not |
| कछु | कुछ भी | any |
| भय | भय | fear |
| न | न | nor |
| दीनता | दीनता या हताशा | dejection or helplessness |
| आई | आई | arose |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.112
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1019
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1018, 1019
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।