उत्तरकाण्ड · दोहा 112 (क) · दोहा
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ॥ ११२ (क)॥
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 7.112 · पुस्तक पृ. 1018, 1019
भावार्थ और शब्दार्थ
1तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ।
मैं तुरंत कौआ हो गया। तब फिर मुनि के चरणों में सिर नवाकर… (एआई-निर्मित अर्थ-प्रारूप)
English explanation
I immediately became a crow. Then, bowing my head once more at the sage’s feet… (AI-drafted interpretation)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तुरत | तुरंत | immediately |
| भयउँ | हो गया | became |
| मैं | मैं, काकभुशुण्डि | I, Kakabhushundi |
| काग | कौआ | a crow |
| तब | तब | then |
| पुनि | फिर | again |
| मुनि | मुनि के | of the sage |
| पद | चरणों में | at the feet |
| सिरु | सिर | head |
| नाइ | नवाकर | having bowed |
2सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ॥ ११२ (क)॥
रघुवंश के रत्न राम का स्मरण करके मैं हर्षित होकर उड़ चला। (एआई-निर्मित अर्थ-प्रारूप)
English explanation
Remembering Rama, the jewel of Raghu’s lineage, I joyfully flew away. (AI-drafted interpretation)
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सुमिरि | स्मरण करके | having remembered |
| राम | भगवान राम को | Lord Rama |
| रघुबंस | रघु के वंश का | of Raghu’s lineage |
| मनि | रत्न | jewel |
| हरषित | हर्षित होकर | joyfully |
| चलेउँ | मैं चल पड़ा | I set off |
| उड़ाइ | उड़कर | flying |
| क | दोहा ११२ के भाग (क) का संदर्भ-चिह्न | reference marker for part (a) of couplet 112 |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- दोहा 112 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 7.112
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1018, 1019
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।