उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।
मूल पाठ
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।
स्रोत अभिलेख 7.113 · पुस्तक पृ. 1020, 1021
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे तात! जिनके हृदयमें श्रीरामजीकी भक्ति नहीं है, उनके सामने इसे कभी भी नहीं कहना चाहिये। मुनिने मुझे बहुत प्रकारसे समझाया। तब मैंने प्रेमके साथ मुनिके चरणोंमें सिर नवाया॥ ७॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1021 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं। कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं।।
English explanation
Dear one, never tell this story to those whose hearts lack devotion to Rama.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| राम | राम की | to Rama |
| भगति | भक्ति | devotion |
| जिन्ह | जिनके | those whose |
| कें | के | possessive marker |
| उर | हृदय में | in the hearts |
| नाहीं | नहीं है | is absent |
| कबहुँ | कभी | ever |
| न | न | not |
| तात | हे प्रिय | dear one |
| कहिअ | कहना | tell |
| तिन्ह | उनके | those people |
| पाहीं | पास, उनसे | to, in their presence |
2 मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा। मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा।।
English explanation
The sage instructed me in various ways; I lovingly bowed my head at his feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनि ने | the sage |
| मोहि | मुझे | me |
| बिबिध | विभिन्न | various |
| भाँति | प्रकार से | in ways |
| समुझावा | समझाया | instructed |
| मैं | मैंने | I |
| सप्रेम | प्रेमपूर्वक | lovingly |
| मुनि | मुनि के | the sage’s |
| पद | चरणों में | at the feet |
| सिरु | सिर | head |
| नावा | झुकाया | bowed |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.113
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1021
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिजीका लोमशजीके पास जाना और शाप तथा अनुग्रह पाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1020, 1021
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