उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।
मूल पाठ
मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।
स्रोत अभिलेख 7.35 · पुस्तक पृ. 943, 944
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे मुनियोंके मनरूपी मानसरोवरमें निरन्तर निवास करनेवाले हंस! आपके चरणकमल ब्रह्माजी और शिवजीके द्वारा वन्दित हैं। आप रघुकुलके केतु, वेदमर्यादाके रक्षक और काल, कर्म, स्वभाव तथा गुण [-रूप बन्धनों] के भक्षक (नाशक) हैं॥ ४॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 943 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मुनि मन मानस हंस निरंतर। चरन कमल बंदित अज संकर।।
English explanation
You are the swan ever dwelling in the lake of the sages’ minds; your lotus feet are revered by Brahma and Shiva.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मुनि | मुनियों के | of sages |
| मन | मनरूपी | in the form of their minds |
| मानस | मानसरोवर में | in Lake Manasa |
| हंस | हंस | swan |
| निरंतर | सदा | ever |
| चरन | चरण | feet |
| कमल | कमलरूपी | lotus-like |
| बंदित | वंदना किए गए | revered |
| अज | ब्रह्मा द्वारा | by Brahma |
| संकर | शिव द्वारा | by Shiva |
2 रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक। काल करम सुभाउ गुन भच्छक।।
English explanation
You are the banner of Raghu’s lineage, protector of the boundaries established by the Vedas, and destroyer of the sway of time, karma, innate disposition, and the qualities of nature.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| रघुकुल | रघुवंश की | of Raghu’s lineage |
| केतु | ध्वजा, गौरवचिह्न | banner, emblem of glory |
| सेतु | मर्यादा, सीमा | boundary, established order |
| श्रुति | वेदों की | of the Vedas |
| रच्छक | रक्षा करने वाले | protector |
| काल | काल | time |
| करम | कर्म | karma |
| सुभाउ | स्वभाव, जन्मगत प्रवृत्ति | innate disposition |
| गुन | प्रकृति के गुण | the qualities of nature |
| भच्छक | निगलने वाले, प्रभाव मिटाने वाले | devourer, destroyer of their sway |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.35
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 943
- सहायक विषय
- पुत्रोत्पत्ति, अयोध्याजीकी रमणीयता, सनकादिका आगमन और संवाद
- मुद्रित पृष्ठ
- 943, 944
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।