उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दउस समय पवनपुत्र हनुमान्जी पवन (पंखा) करने लगे। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रोंमें [प्रेमाश्रुओंका] जल भर आया। [शिवजी कहने लगे—] हे गिरिजे! हनुमान्जीके समान न तो कोई बड़भागी है और न कोई श्रीरामजीके चरणोंका प्रेमी ही है, जिनके प्रेम और सेवाकी [स्वयं] प्रभुने अपने श्रीमुखसे बार-बार बड़ाई की है॥ ४-५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 956 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।
हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।
स्रोत अभिलेख 7.5 · पुस्तक पृ. 956, 956
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 मारुतसुत तब मारूत करई। पुलक बपुष लोचन जल भरई।।
English explanation
Then Hanuman, the wind god’s son, fanned him. His body thrilled with goosebumps, and his eyes filled with tears.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| मारुतसुत | पवनपुत्र हनुमान | Hanuman, son of the wind god |
| तब | तब | then |
| मारूत | हवा | a breeze |
| करई | करते हैं | creates |
| पुलक | रोमांचित | thrilled with goosebumps |
| बपुष | शरीर | body |
| लोचन | आँखें | eyes |
| जल | आँसुओं से | with tears |
| भरई | भरती हैं | fill |
2 हनूमान सम नहिं बड़भागी। नहिं कोउ राम चरन अनुरागी।।
English explanation
No one is as fortunate as Hanuman, nor is anyone so devoted to Rama’s feet.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हनूमान | हनुमान, राम के भक्त | Hanuman, Rama’s devotee |
| सम | के समान | equal to |
| नहिं | नहीं | not |
| बड़भागी | अत्यंत भाग्यशाली | greatly fortunate |
| नहिं | नहीं | not |
| कोउ | कोई | anyone |
| राम | राम के | Rama’s |
| चरन | चरणों का | feet |
| अनुरागी | प्रेमी | lovingly devoted to |
3 गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई। बार बार प्रभु निज मुख गाई।।
English explanation
O Parvati, the Lord himself repeatedly praised Hanuman’s love and service with his own lips.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गिरिजा | हे पार्वती, पर्वत की पुत्री | O Parvati, daughter of the mountain |
| जासु | जिनकी | whose |
| प्रीति | प्रेम | love |
| सेवकाई | सेवा | service |
| बार | बार | time |
| बार | बार | after time |
| प्रभु | प्रभु राम ने | Lord Rama |
| निज | अपने | his own |
| मुख | मुख से | with his lips |
| गाई | प्रशंसा गाई | sang the praises of |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.5
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 956
- सहायक विषय
- नारदजीका आना और स्तुति करके ब्रह्मलोकको लौट जाना
- मुद्रित पृष्ठ
- 956, 956
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।