उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।
मूल पाठ
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।
स्रोत अभिलेख 7.82 · पुस्तक पृ. 984, 985
भावार्थ
मूल पाठ के बादअनेक ब्रह्माण्डोंमें भटकते मुझे मानो एक सौ कल्प बीत गये। फिरता-फिरता मैं अपने आश्रममें आया और कुछ काल वहाँ रहकर बिताया॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 984 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका। बीते मनहुँ कल्प सत एका।।
English explanation
As I wandered through many universes, it seemed that a hundred cosmic ages had passed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| भ्रमत | भटकते हुए | while wandering |
| मोहि | मुझे; मेरे लिए | to me; for me |
| ब्रह्मांड | ब्रह्मांडों में | through universes |
| अनेका | अनेक | many |
| बीते | बीत गए | passed |
| मनहुँ | मानो | as though |
| कल्प | कल्प; अत्यंत दीर्घ सृष्टिकाल | cosmic ages |
| सत | सौ | hundred |
| एका | एक | one |
2 फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ। तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ।।
English explanation
Wandering on, I came to my own hermitage and stayed there again for some time.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| फिरत | घूमते | wandering |
| फिरत | घूमते | continuing to wander |
| निज | अपने | my own |
| आश्रम | आश्रम में | to the hermitage |
| आयउँ | मैं आया | I came |
| तहँ | वहाँ | there |
| पुनि | फिर | again |
| रहि | रहकर | staying |
| कछु | कुछ | some |
| काल | समय | time |
| गवाँयउँ | मैंने बिताया | I spent |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.82
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 984
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 984, 985
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।