उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दद्वापरमें श्रीरघुनाथजीके चरणोंकी पूजा करके मनुष्य संसारसे तर जाते हैं, दूसरा कोई उपाय नहीं है। और कलियुगमें तो केवल श्रीहरिकी गुणगाथाओंका गान करनेसे ही मनुष्य भवसागरकी थाह पा जाते हैं॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1005 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।
स्रोत अभिलेख 7.103 · पुस्तक पृ. 1005, 1006
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 द्वापर करि रघुपति पद पूजा। नर भव तरहिं उपाय न दूजा।।
English explanation
In the age of Dvapara, people cross worldly existence by worshipping the feet of Rama, lord of Raghu’s lineage; there is no other means.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| द्वापर | द्वापरयुग में | in the age of Dvapara |
| करि | करके | having performed |
| रघुपति | रघुवंश के स्वामी राम के | of Rama, lord of Raghu’s lineage |
| पद | चरणों की | of the feet |
| पूजा | पूजा | worship |
| नर | मनुष्य | people |
| भव | संसार-बंधन | worldly existence and bondage |
| तरहिं | पार होते हैं | cross beyond |
| उपाय | साधन | means |
| न | नहीं है | there is no |
| दूजा | दूसरा | other |
2 कलिजुग केवल हरि गुन गाहा। गावत नर पावहिं भव थाहा।।
English explanation
In the age of Kali, singing Hari’s virtues alone is the means; by singing them, people reach the farther shore of worldly existence.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कलिजुग | कलियुग में | in the age of Kali |
| केवल | केवल | only |
| हरि | भगवान हरि के | of Lord Hari |
| गुन | गुणों का | of the virtues |
| गाहा | गान | singing |
| गावत | गाते हुए | while singing |
| नर | मनुष्य | people |
| पावहिं | पाते हैं | attain |
| भव | संसार-सागर का | of the ocean of worldly existence |
| थाहा | पार | the farther shore |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.103
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1005
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1005, 1006
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।