उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
मूल पाठ
तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।
स्रोत अभिलेख 7.117 · पुस्तक पृ. 1025, 1027
भावार्थ
मूल पाठ के बादतभीसे जीव संसारी (जन्मने-मरनेवाला) हो गया। अब न तो गाँठ छूटती है और न वह सुखी होता है। वेदों और पुराणोंने बहुत-से उपाय बतलाये हैं। पर वह (ग्रन्थि) छूटती नहीं वरं अधिकाधिक उलझती ही जाती है॥ ३॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1026 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
1 तब ते जीव भयउ संसारी। छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी।।
English explanation
Since then the soul has been bound to worldly existence; the knot does not loosen, and it finds no happiness.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| तब | तब | then |
| ते | से | since |
| जीव | व्यक्तिगत आत्मा | individual soul |
| भयउ | हो गया | became |
| संसारी | संसार में बँधा | bound to worldly existence |
| छूट | छूटती | loosens |
| न | नहीं | not |
| ग्रंथि | गाँठ | knot |
| न | नहीं | not |
| होइ | होता | becomes |
| सुखारी | सुखी | happy |
2 श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई। छूट न अधिक अधिक अरुझाई।।
English explanation
The Vedas and Puranas describe many remedies, yet the knot does not loosen and becomes increasingly entangled.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| श्रुति | वेद | the Vedas |
| पुरान | पुराण | the Puranas |
| बहु | अनेक | many |
| कहेउ | बताए | described |
| उपाई | उपाय | remedies |
| छूट | छूटती | loosens |
| न | नहीं | not |
| अधिक | अधिक | more |
| अधिक | और अधिक | and more |
| अरुझाई | उलझती है | becomes entangled |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.117
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1026
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1025, 1027
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।