उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दहे गोसाईं! वह मायाके वशीभूत होकर तोते और वानरकी भाँति अपने-आप ही बँध गया। इस प्रकार जड़ और चेतनमें ग्रन्थि (गाँठ) पड़ गयी। यद्यपि वह ग्रन्थि मिथ्या ही है, तथापि उसके छूटनेमें कठिनता है॥ २॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1026 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
स्रोत अभिलेख 7.117 · पुस्तक पृ. 1025, 1027
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 सो मायाबस भयउ गोसाईं। बँध्यो कीर मरकट की नाई।।
English explanation
O master, that soul came under Maya's sway and became bound like a parrot or a monkey.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| सो | वह जीव | that soul |
| मायाबस | माया के अधीन | under Maya's sway |
| भयउ | हो गया | became |
| गोसाईं | हे स्वामी | O master |
| बँध्यो | बँध गया | became bound |
| कीर | तोता | parrot |
| मरकट | बंदर | monkey |
| की | की | of |
| नाई | तरह | in the manner |
2 जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई। जदपि मृषा छूटत कठिनई।।
English explanation
A knot formed between the insentient and the conscious; although unreal, it is difficult to undo.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जड़ | अचेतन पदार्थ | the insentient |
| चेतनहि | चेतन आत्मा के साथ | with the conscious soul |
| ग्रंथि | गाँठ | knot |
| परि | पड़ | having formed |
| गई | गई | came to be |
| जदपि | यद्यपि | although |
| मृषा | मिथ्या | unreal |
| छूटत | छूटने में | in being undone |
| कठिनई | कठिनाई है | there is difficulty |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.117
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1026
- सहायक विषय
- ज्ञान-भक्ति-निरूपण, ज्ञानदीपक और भक्तिकी महान् महिमा
- मुद्रित पृष्ठ
- 1025, 1027
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।