उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।
मूल पाठ
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।
गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।।
स्रोत अभिलेख 7.105 · पुस्तक पृ. 1007, 1008
भावार्थ
मूल पाठ के बादहे सर्पोंके शत्रु गरुडज़ी! सुनिये। मैं दीन, मलिन (उदास), दरिद्र और दुखी होकर उज्जैन गया। कुछ काल बीतनेपर कुछ सम्पत्ति पाकर फिर मैं वहीं भगवान् शंकरकी आराधना करने लगा॥ १॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 1007 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
शब्द-दर-शब्द अर्थ
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1 गयउँ उजेनी सुनु उरगारी। दीन मलीन दरिद्र दुखारी।।
English explanation
Listen, Garuda! I went to Ujjain, wretched, unclean, penniless, and distressed.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गयउँ | मैं गया | I went |
| उजेनी | उज्जैन नगरी | the city of Ujjain |
| सुनु | सुनिए | listen |
| उरगारी | हे सर्पों के शत्रु गरुड़ | O Garuda, enemy of serpents |
| दीन | दीन-हीन | wretched |
| मलीन | मलिन | unclean |
| दरिद्र | निर्धन | penniless |
| दुखारी | दुखी | distressed |
2 गएँ काल कछु संपति पाई। तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई।।
English explanation
After some time passed, I acquired a little wealth. There I again began serving Shiva.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| गएँ | बीतने पर | upon passing |
| काल | समय | time |
| कछु | कुछ | some |
| संपति | धन-संपत्ति | wealth |
| पाई | प्राप्त की | acquired |
| तहँ | वहाँ | there |
| पुनि | फिर | again |
| करउँ | मैं करने लगा | I began doing |
| संभु | शिव की | of Shiva |
| सेवकाई | सेवा-उपासना | devotional service |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.105
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 1007
- सहायक विषय
- काकभुशुण्डिका अपनी पूर्वजन्मकथा और कलिमहिमा कहना
- मुद्रित पृष्ठ
- 1007, 1008
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।