उत्तरकाण्ड · चौपाई · चौपाई
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
भावार्थ
पहले अर्थ, फिर शब्दतथा श्रीरामजीके चरणोंमें विश्वास उत्पन्न होता है और मनुष्य बिना ही परिश्रम संसाररूपी समुद्रसे तर जाता है॥ ५॥
स्रोत: सचित्र, सटीक गीता प्रेस संस्करण · PDF पृ. 961 · मूल पाठ अलग स्रोत-अभिलेख से · स्रोत-स्थिति
मूल पाठ
उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
स्रोत अभिलेख 7.55 · पुस्तक पृ. 960, 961
शब्द-दर-शब्द अर्थ
AI शब्दार्थनीचे के शब्दार्थ AI प्रारूप हैं; विद्वान-समीक्षा बाकी है। ऊपर का भावार्थ PDF संस्करण से है।अर्थ कैसे बने, इसकी प्रक्रिया स्रोत पृष्ठ पर पढ़ें।
1 उपजइ राम चरन बिस्वासा। भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा।।
English explanation
Faith in Rama’s feet arises, and a person crosses the ocean of worldly existence without effort.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| उपजइ | उत्पन्न होता है | arises |
| राम | भगवान राम के | of Lord Rama |
| चरन | चरणों में | in the feet |
| बिस्वासा | विश्वास; श्रद्धा | faith; trust |
| भव | संसाररूपी | of worldly existence |
| निधि | समुद्र | ocean |
| तर | पार कर लेता है | crosses |
| नर | मनुष्य | a person |
| बिनहिं | बिना ही | without any |
| प्रयासा | प्रयास के | effort |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- उत्तरकाण्ड
- पद
- चौपाई
- स्रोत अभिलेख
- 7.55
- भावार्थ पृष्ठ
- PDF पृ. 961
- सहायक विषय
- शिव-पार्वती-संवाद, गरुड़-मोह, गरुड़जीका काकभुशुण्डिसे रामकथा और राम-महिमा सुनना
- मुद्रित पृष्ठ
- 960, 961
विषय-शीर्षक पुस्तक की विषय-सूची से हैं; पृष्ठ-मिलान अनुमानित है और एक अंश में कई प्रसंग आ सकते हैं।