किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 14 · दोहा/सोरठा
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.14 · पुस्तक पृ. 695, 696
भावार्थ और शब्दार्थ
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1 हरित भूमि तृन संकुल समुझि परहिं नहिं पंथ।
भूमि हरी और घास से भरी हुई है; रास्ते पहचान में नहीं आते।
English explanation
The earth is green and thick with grass; the paths cannot be discerned.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| हरित | हरी | green |
| भूमि | भूमि | the earth |
| तृन | घास से | with grass |
| संकुल | भरी हुई | densely covered |
| समुझि | पहचान में | discernible |
| परहिं | आते हैं | are |
| नहिं | नहीं | not |
| पंथ | रास्ते | paths |
2 जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सदग्रंथ।।14।।
जैसे पाखंडपूर्ण मतवादों के कारण सद्ग्रंथ ओझल हो जाते हैं।
English explanation
Just as worthy scriptures become obscured by hypocritical doctrines.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिमि | जैसे | just as |
| पाखंड | पाखंडपूर्ण | hypocritical |
| बाद | मतवादों | doctrines |
| तें | के कारण | because of |
| गुप्त | ओझल | obscured |
| होहिं | हो जाते हैं | become |
| सदग्रंथ | सद्ग्रंथ; उत्तम शास्त्र | worthy scriptures |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 14
- स्रोत अभिलेख
- 4.14
- सहायक विषय
- वर्षा-ऋतु-वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 695, 696
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