किष्किन्धाकाण्ड · दोहा 15 (क) · दोहा/सोरठा
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।
मूल पाठ · स्रोत अभिलेख 4.15 · पुस्तक पृ. 696, 697
भावार्थ और शब्दार्थ
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1कबहुँ प्रबल बह मारुत जहँ तहँ मेघ बिलाहिं।
कभी तेज हवा बहती है और बादल इधर-उधर बिखरकर विलीन हो जाते हैं।
English explanation
Sometimes a strong wind blows, and the clouds scatter and disappear here and there.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| कबहुँ | कभी | sometimes |
| प्रबल | प्रबल | strong |
| बह | बहती है | blows |
| मारुत | हवा | wind |
| जहँ | यहाँ | here |
| तहँ | वहाँ | and there |
| मेघ | बादल | clouds |
| बिलाहिं | बिखरकर विलीन होते हैं | scatter and disappear |
2 जिमि कपूत के उपजें कुल सद्धर्म नसाहिं।।15(क)।।
जैसे कुपुत्र के जन्म लेने पर कुल के सदाचार नष्ट हो जाते हैं।
English explanation
Just as a family’s virtuous traditions perish when a wayward son is born.
| मूल शब्द | हिन्दी अर्थ | English meaning |
|---|---|---|
| जिमि | जैसे | just as |
| कपूत | कुपुत्र | a wayward son |
| के | के | of |
| उपजें | जन्म लेने पर | upon being born |
| कुल | कुल के | the family’s |
| सद्धर्म | सदाचार और धर्मपरंपराएँ | virtuous traditions |
| नसाहिं | नष्ट हो जाते हैं | perish |
| क | पद-संदर्भ का चिह्न ‘क’ | verse reference marker ‘क’ |
स्रोत और प्रसंग
- काण्ड
- किष्किन्धाकाण्ड
- पद
- दोहा/सोरठा 15 (क)
- स्रोत अभिलेख
- 4.15
- सहायक विषय
- वर्षा-ऋतु-वर्णन
- मुद्रित पृष्ठ
- 696, 697
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